पंकज का यही मिजाज था—बेपरवाह, बेफिक्र, और हर हाल में जिंदगी का मजा लूटने वाला। पढ़ाई उसके लिए बस एक मजबूरी थी, जिसे वह किसी तरह ढो रहा था, मगर असल जिंदगी उसके लिए कॉलेज की कैंटीन, दोस्तों की महफिल और कभी-कभार होने वाली रातभर की बहसों में बसती थी। उसने मुझे कई बार समझाया था—"यार, डिग्री तो जैसे-तैसे मिल ही जाएगी, पर ये दिन लौटकर नहीं आएंगे!" और सच कहूं तो, कहीं न कहीं मैं भी उसकी इस बात से सहमत था। आखिरकार, इंजीनियरिंग सिर्फ किताबों से थोड़े ही सीखी जाती है, असली सीख तो उन्हीं ठहाकों, उन्हीं बहसों और उन्हीं नाइट आउट्स में मिलती थी, जहाँ हम जिंदगी को समझने की कोशिश करते थे, अपनी शर्तों पर।
पर पंकज की इस बेफिक्री के पीछे कुछ तो ऐसा था जिसे वह कभी खुलकर नहीं कहता था। उसकी बातों में जो लापरवाही दिखती थी, वह दरअसल कहीं गहरे छुपे डर और जिम्मेदारियों की परछाई थी। उसके पिता गाँव में एक छोटे किसान थे, और परिवार की उम्मीदों का पूरा बोझ उसके कंधों पर था। लेकिन पंकज ने कभी इन बातों को खुद पर हावी नहीं होने दिया। वह कहता, "जिंदगी में टेंशन लेने का नहीं, देने का!" और इसी फॉर्मूले पर जीता था।
हमारी रातें कभी न खत्म होने वाली बहसों में गुजरतीं—कभी दुनिया बदलने के सपनों पर, कभी सिस्टम को कोसने पर, तो कभी यह सोचने में कि एग्जाम में पास कैसे हुआ जाए! उसका कमरा हमेशा बिखरा रहता, किताबें धूल खा रही होतीं, और मेज पर या तो अधूरी असाइनमेंट्स पड़ी होतीं या फिर अधखाली चाय के कप। लेकिन जब भी कोई दोस्त परेशानी में होता, वही पंकज सबसे पहले मदद के लिए खड़ा होता।
एक बार, जब मेरे सेमेस्टर एग्जाम के नंबर उम्मीद से काफी कम आए, तो मैं बेहद परेशान था। पंकज ने मेरी ओर देखा, मुस्कुराया और बोला, "यार, जिंदगी के नंबर नहीं कटने चाहिए, बाकी सब मैनेज हो जाएगा!" उसकी यह बात आज भी मेरे ज़ेहन में गूंजती है। शायद यही वजह है कि पंकज मेरे लिए सिर्फ एक दोस्त नहीं, बल्कि एक जीती-जागती सीख बन गया था—जो जिंदगी को अपने अंदाज में जीने की हिम्मत सिखाता था।
पंकज की यही खासियत थी—वह जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीता था। उसे दुनिया की परवाह नहीं थी, न ही इस बात की कि लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं। क्लास में सबसे पीछे बैठने वाला, असाइनमेंट्स को आखिरी वक्त तक टालने वाला, और लेक्चर के दौरान या तो ऊँघता या फिर किसी और दुनिया में खोया रहने वाला पंकज, असल में एक जिंदादिल इंसान था। उसकी हंसी में एक अजीब-सी बेफिक्री थी, जैसे उसे जिंदगी की हर परेशानी का हल मिल चुका हो।
लेकिन इस बेपरवाह चेहरे के पीछे एक और पंकज था, जिसे बहुत कम लोग जानते थे। रात के सन्नाटे में, जब सब सो चुके होते, तब कभी-कभी मैं उसे अपने छोटे-से कमरे में चुपचाप बैठा देखता, किताबों के पन्ने पलटते हुए, शायद खुद से ही लड़ते हुए। वह पढ़ाई से भागता नहीं था, बस उसके लिए यह सब उतना आसान नहीं था जितना शायद बाकी लोगों के लिए था। एक दिन मैंने उससे पूछा, "तू चाहता क्या है जिंदगी से?" उसने एक गहरी सांस ली, थोड़ी देर चुप रहा, फिर हंसते हुए बोला, "यार, बस इतनी सी चाहत है कि घरवाले मुझ पर गर्व करें, और मैं खुद पर शर्मिंदा न होऊं!"
उस दिन पहली बार मुझे एहसास हुआ कि पंकज सिर्फ एक लापरवाह लड़का नहीं था, बल्कि एक ऐसा इंसान था जो अपने तरीके से जिंदगी की जंग लड़ रहा था। वह किताबों से ज्यादा जिंदगी से सीखता था। उसे नंबरों से फर्क नहीं पड़ता था, उसे इस बात से फर्क पड़ता था कि वह अपने लोगों के लिए क्या कर सकता है। शायद इसी वजह से, जब सब उसे एक 'नालायक' मानते थे, तब भी मैं जानता था कि वह जिंदगी के असली इम्तिहान में सबसे आगे रहने वाला था।
समय बीतता गया, सेमेस्टर दर सेमेस्टर पंकज अपनी ही धुन में चलता रहा। जहां बाकी लोग ग्रेड्स और प्लेसमेंट्स की दौड़ में लगे थे, वहीं वह जिंदगी को अपने अंदाज में जीने में व्यस्त था। उसने कभी टॉप ग्रेड्स नहीं लाए, न ही किसी नामी कंपनी में प्लेसमेंट लिया, लेकिन जब कॉलेज खत्म हुआ, तो सबसे ज्यादा खुश वही था। उसने जिंदगी को सिर्फ पढ़ाई के तराजू में तौलने से इनकार कर दिया था। कुछ सालों बाद, जब हम सभी कॉर्पोरेट की भागदौड़ में उलझे हुए थे, पंकज ने अपनी राह खुद बनाई—एक ऐसा सफर जहां वह अपने शौक, अपने जुनून के साथ जी रहा था।
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो पंकज सिर्फ एक दोस्त नहीं, बल्कि एक सीख की तरह लगता है—सीख कि सफलता का मतलब सिर्फ डिग्रियां या बड़ी नौकरियां नहीं होतीं। असली जीत यह है कि हम जिंदगी को अपनी शर्तों पर जिएं, और यही पंकज ने किया। कॉलेज में भले ही वह पीछे रह गया हो, लेकिन जिंदगी में वह सबसे आगे निकला
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